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Indi Reporter || India & Beyond: Stories Shaping Our World Sites > Indi Reporter (Hindi) > Blog > व्यापार > अर्थव्यवस्था > प्राकृतिक सिंदूर के पौधे की खेती जयपुर में, आप भी अपने आंगन में उगा सकते हैं “नेचुरल सिंदूर”
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प्राकृतिक सिंदूर के पौधे की खेती जयपुर में, आप भी अपने आंगन में उगा सकते हैं “नेचुरल सिंदूर”

Rajesh Kumawat
Last updated: June 5, 2025 3:55 pm
Rajesh Kumawat Published June 5, 2025
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विष्णु लांबा, indireporter.com

वर्षों से कर रहे थे सिंदूर के पौधे तैयार,
आज प्रधानमंत्री मोदी ने दिया अभियान को बल

जयपुर – विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री द्वारा सिंदूर के पौधे का रोपण करना, खासकर ऑपरेशन सिंदूर के बाद, एक प्रतीकात्मक संदेश है, शहीद बेटियों के सिंदूर की रक्षा और प्रकृति का संरक्षण एक साथ हो ! इसी बीच ट्री मेन ऑफ इंडिया के नाम से मशहूर पर्यावरणविद् विष्णु लाम्बा के नेतृत्व में संचालित श्री कल्पतरु संस्थान आज अचानक चर्चाओं में आ गया ! इस संस्थान के वालंटियर पिछले 30 वर्षों से सिंदूर के पौधे तैयार करके देश भर में वितरण कर रहे हैं और केमिकल युक्त सिंदूर को खत्म करने का प्रयास कर रहे हैं ! संस्थान द्वारा वर्षों से सिंदूर पौधे के संरक्षण और प्रचार-प्रसार के प्रयास आज एक ऐतिहासिक मोड़ पर पहुंचे हैं। यह पौधा केवल रंग या औषधि का स्रोत नहीं है, यह भारत की मातृशक्ति और सम्मान का प्रतीक बन गया है। हिमालयन बेल्ट में मिलने वाला दुर्लभ कमीला जतन से अब मैदानी क्षेत्रों में भी उगाया जाने लगा है। श्री कल्पतरु संस्थान द्वारा सालों पहले लगाया कमीला फलों से लद गया है। सुहागिनों का सौभाग्य बढ़ाने वाला सिंदूर इसकी फली से निकलता है। मान्यता है कि वन प्रवास के दौरान माता सीता इसी फल के पराग को अपनी मांग में लगाती थीं। महाबली हनुमान इसी का लेप तन पर लगाया करते थे। औषधीय गुणों से भरपूर कमीला को दर्जनों रोगों के उपचार हेतु प्रयोग किया जाता है।

कमीला को रोरी, सिंदूरी, कपीला, कमूद, रैनी, सेरिया आदि नामों से भी जाना जाता है। संस्कृत भाषा में कम्पिल्लक, रक्तांग रेची, रक्त चूर्णक एवं लैटिन में मालोटस, फिलिपिनेसिस नाम से प्रसिद्ध है। बीस से पच्चीस फीट ऊंचे इस वृक्ष में फली गुच्छ के रूप में लगती है। फली का आकार मटर की फली की तरह होता है व शरद ऋतु में वृक्ष फली से लद जाता है। फली के अंदर के भाग का आकार भी मटर की फली जैसा होता है जिसमें सरसों के आकार से थोड़े मोटे दाने होते हैं जो लाल रंग के पराग से ढके होते हैं जिसे बिना कुछ मिलाए विशुद्ध सिंदूर, रोरी, कुमकुम की तरह प्रयोग किया जाता है। यद्यपि यह पौधा हिमालय बेल्ट में होता है लेकिन विशेष देख-रेख करके मैदानी क्षेत्रों में उगाया जा सकता है।

विष्णु लाम्बा नें कुछ सालों पहले यह पौधा लगाया। उन्होंने बताया कि विश्व गौ ग्राम यात्रा में जयपुर आये गौकरण पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य पूज्य राघवेश्वर भारती जी नें दिया था, लगाने के तीन-चार साल बाद इसमें फल आने लगा।

वैद्य शम्भु शर्मा का दावा है कि कमीला औषधीय गुणों से भरपूर है। इससे अनेक रोगों का उपचार होता है। शरीर की चेष्टावह नाड़ियों, अवसादक अन्नदह प्रणाली पर इसकी प्रक्षेलक क्रिया होती है। त्वचा रोग के उपचार में इसका प्रमुख रूप से प्रयोग किया जाता है। आध्यात्मिक विचारधारा रखने वालों के मतानुसार इससे प्राप्त चंदन का प्रयोग आयुर्बल वर्धक एवं मानसिक शांति प्रदान करता है। जो कृत्रिम सिंदूर, रोरी, कुमकुम से उत्तम होता है। यह पहाड़ी क्षेत्रों में भारत, चीन, वर्मा, सिंगापुर, मलाया, लंका, अफ्रीका आदि में ज्यादा पाया जाता है, इसके एक पेड़ से प्रतिवर्ष 8 से दस किलो से अधिक सिंदूर निकलता है

गले में मंगलसूत्र, माथे पर गोल बिन्दी और मांग में लाल सिंदूर। किसी भी भारतीय महिला की सुहागन होने की पहली पहचान होती है। उन सबों में सबसे अहम होती है मांग की सिंदूर। जिसे मांग में भरकर अपने को सुहागन होने का पहला सबूत मानी जाती है। अबतक तो यह सिंदूर बाजार से पतियों के द्वारा खरीद कर अपने मांग को सजाती थी।

लेकिन महिलाएं अब सिंदूर के लिए अपने पति की आस में नहीं रहेंगी, बल्कि श्री कल्पतरु संस्थान द्वारा लाम्बा गाँव में स्थापित ‘कल्पतरु आरण्य’ में सिंदूर का उत्पादन होनें जा रहा है, जहां इनकी मांग पूरी हो जायेगी, इसकी एक बानगी के रूप में इन दिनों विष्णु लाम्बा जहां भी जा रहे है, लोगों को सिंदूर के ताज़ा फल भेंट कर रहे है !

संस्थान द्वारा लगाए गए पोधे से अब इस गांव की महिलाएं प्रकृति प्रदत्त सिंदूर का उपयोग अपनी मांग के लिये कर सकेगी. वहीं केमिकल प्रयुक्त सिंदूर को बाय-बाय कर देगी. संस्थान के इस प्रयास का असर इसके आस-पास तकरीबन एक दर्जन गांवों पर भी दिखना शुरू हो गया है और पड़ोस के गांव की महिलाएं भी बड़ी संख्या में सिंदूर के पौधे लगानें की मांग रही हैं।

यूं तो बाजार में कई ब्रांड के सिंदूरों की बिक्री हो रही है। लेकिन बहुतायत में बिक्री होने के कारण लोकल कंपनियां ब्रांड सिंदूर में कई प्रकार के केमिकल मिलाकर बेच देते हैं जिससे माथे में त्वचा रोग होने का खतरा बढ़ जाता है।

डॉ सी.एल.सैन के मुताबिक यह सही है कि बाजार के सिंदूर में कई प्रकार की मिलावट रहती है जिससे त्वचा कैंसर होने का खतरा बढ़ जाता है। अगर प्राकृतिक रूप से शुद्ध सिंदूर महिलाएं अपनी मांग में लगाती हैं तो निश्चित रूप से बीमारी दूर रहेगी। डॉ. सैन का कहना है कि वे महिलाओं को यही सिंदूर लगाने की सलाह देंगे।

श्री कल्पतरु संस्थान जल्द ही प्राकृतिक सिंदूर की खेती करनें की तेयारी कर रहा है, इस प्रोजेक्ट में सिंदूर के एक लाख पौधों की नर्सरी रोपने की तैयारी की जा रही है। प्राकृतिक रूप से तैयार होने वाले इस सिंदूर का उपयोग सर्वहित में किया जाएगा।

महिलाओं के सौभाग्य के प्रतीक सिंदूर के बारे में सब जानते हैं, लेकिन कम लोगों को जानकारी होगी कि दरअसल, सिंदूर पौधे का नाम है। वैज्ञानिक उपकरणों के जरिए पौधे से सिंदूर निकालने का तरीका खर्चीला होने से देसी तरीका अपनाया जाता है। संस्थान के कार्यकर्ताओं नें विष्णु लाम्बा की देख-रेख में प्रोजेक्ट तैयार किया है। इसके तहत संस्थान पहले पौधे तैयार करेगा। फिर पौधे किसानों से तैयार करवाए जाएंगे।

सिंदूर के व्यावसायिक उत्पादन के साथ ही वनस्पति कीटनाशक के रूप में इसका इस्तेमाल करने पर शोध हो रहा है। गौमूत्र के साथ इसे मिलाकर धान की फसलों पर छिड़काव कर देखा जा रहा है कि फसलों की बीमारियों पर यह कितना कारगर रहता है।

सिंदूर के पौधे तैयार होने में तीन से चार साल लगते हैं। परिपक्व होने पर उनमें फूल और बीज आते हैं। बीजों से सिंदूर तैयार होता है। संस्थान में बीजों को महीन पीसकर सिंदूर बनाया जाएगा।

बाजारमें बिकने वाला सिंदूर रसायनों से बना होता है। इसमें लेड की रासायनिक मिलावट होने के कारण सिंदूर लगाने वाली महिलाओं को सिरदर्द, सांस में तकलीफ की शिकायत होती है। प्राकृतिक रूप से तैयार होने वाला सिंदूर त्वचा या सेहत को नुकसान नहीं पहुंचाता। बाजार में इसकी कीमत अधिक है, इसलिए कम खर्च वाले तरीके से उत्पादन कर कमर्शियल उपयोग में लाने की योजना बनाई गई है।

  • टोंक जिले के लाम्बा गांव की महिलाएं खेत में सिन्दूर उगा रही हैं. सिन्दूर के इन पौधों के फलों से बीज निकाल कर उन्हें हथेली पर मसलने पर उनमें से सिन्दूरी रंग निकलता है.
  • इसी प्राकृतिक रंग को महिलाएं अपनी मांग में सजा रही हैं.
  • इन महिलाओं की देखा-देखी आसपास के गांवों की महिलाओं ने भी घरों में सिंदूर के पौधे लगाने शुरू कर दिए हैं.
  • बाज़ार में बिकने वाले सिन्दूर में केमिकल होने की वजह से यह त्वचा के लिए नुक़सानदेह माना जाता है.
  • अमेरिका ने अपने देश में सिन्दूर पर पाबंदी लगाते हुए कहा था कि इसमें काफ़ी मात्र में सीसा होता है और सीसा सेहत के लिए नुक़सानदेह है.
  • सिंदूर लैड ऑक्साइड यानी पारा युक्त पदार्थ को पीसकर बनाया जाता है.

-सिंदूर पानी में नहीं घुलता और न किसी चीज पर रंग छोड़ता है.

  • यह 400 से 500 रुपये प्रति किलो की दर से बाज़ार में उपलब्ध है.
  • दूसरी चीज़ों की ही तरह नक़ली सिंदूर भी धड़ल्ले से बाज़ार में बेचा जा रहा है. अरारोट के पाउडर में गिन्नार और नारंगी रंग मिलाया जाता है. फिर इस मिश्रण को छान लिया जाता है. इसके बाद इस सिंदूरी पाउडर को धूप में सुखाया जाता है और इस तरह नक़ली या सस्ता सिंदूर बनाया जाता है.
  • इसमें सस्ते रंगों का इस्तेमाल किया जाता है, जो त्वचा को नुक़सान पहुंचाते हैं
  • सिन्दूर को शहद में मिलाकर कपडे पर लगाकर दर्द वाली जगह पर रखने और ऊपर से सिंकाई करने से पसली के दर्द में आराम मिलता है.
  • एक ग्राम शिला सिन्दूर के चौथाई भाग को १० मि.ली. तुलसी के रस के साथ बुखार आने से पहले देने से मलेरिया का बुखार ठीक होता है.बुखार आने के बाद हर २-२ घंटे में पिलाने से बुखार नहीं आता.
  • एक ग्राम का चौथाई भाग रस सिन्दूर , एक ग्राम त्रिफला और एक ग्राम वायविडंग सुबह शाम सेवन करने से भगंदर ठीक होता है.
  • कप्प्र के रस में सिन्दूर मिलाकर लगाने से पुराने से पुराना घाव या नासूर ठीक हो जाता है.
  • गर्भवती की उलटी रोकने के लिए एक ग्राम का चौथाई सिन्दूर , त्रिकुटा ,जीरा और धनिया को पीसकर इसका ३ ग्राम शहद के साथ चटायें.
  • कई आयुर्वेदिक योगों में सिन्दूर के कई रूप जैसे सुवर्ण सिन्दूर, मल्ल सिन्दूर, ताम्र सिन्दूर, रस सिन्दूर , शिला सिन्दूर आदि का उपयोग किया जाता है.
  • विवाह के बाद वधु को सिन्दूर लगाया जाता है क्योंकि यह प्राण शक्ति को करता है जो उसकी सभी शारीरिक और मानसिक समस्याओं को दूर कर स्वस्थ भावी पीढ़ी और गृहस्थी के निर्माण में सहायक होता है.
  • यह यौन शक्ति को स्वस्थ बनाता है

-सिंदूर नेपाल में बहुतायात से पाया जाता है

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