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“मानगढ़ धाम” आदिवासियों के बलिदान को राष्ट्रीय सम्मान

Rajesh Kumawat
Last updated: October 24, 2026 1:25 am
Rajesh Kumawat Published October 24, 2026
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डॉ दीपमाला रावत, indireporter.com

मानगढ़ धाम : आदिवासी बलिदान को राष्ट्रीय सम्मान देने का समय
1913 के ऐतिहासिक नरसंहार की स्मृति, गोविंद गुरु के संघर्ष और जनजातीय स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत को राष्ट्रीय स्मारक के रूप में प्रतिष्ठित करना आवश्यक है

भारत का स्वतंत्रता संग्राम केवल बड़े नगरों, राजमहलों, प्रसिद्ध व्यक्तियों और प्रसिद्ध आंदोलनों तक सीमित नहीं था। देश के जंगलों, पहाड़ों और दूरस्थ जनजातीय अंचलों में भी स्वतंत्रता, स्वाभिमान और सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष की ऐसी गाथाएँ लिखी गईं, जिन्होंने इतिहास की दिशा निर्धारित की। इन्हीं गौरवशाली गाथाओं में राजस्थान के बांसवाड़ा जिले में स्थित मानगढ़ धाम का नाम विशेष महत्त्व रखता है। यह वह पवित्र भूमि है, जहाँ 17 नवंबर 1913 को ब्रिटिश शासन की गोलियों ने सैकड़ों नहीं, बल्कि ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार लगभग 1,500 से अधिक आदिवासियों के जीवन को समाप्त कर दिया।
मानगढ़ धाम का इतिहास केवल एक नरसंहार का इतिहास नहीं है। यह आदिवासी समाज की अस्मिता, संगठन, सामाजिक सुधार, सांस्कृतिक चेतना और देश की स्वतंत्रता के लिए दिए गए बलिदान का प्रतीक है। इसलिए इसे राष्ट्रीय स्मारक के रूप में प्रतिष्ठित करने की मांग केवल एक स्थान के विकास की मांग नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास में जनजातीय समाज के योगदान को समुचित पहचान दिलाने का प्रश्न है।
मानगढ़ धाम की भौगोलिक स्थिति और ऐतिहासिक महत्त्व
मानगढ़ धाम राजस्थान के बांसवाड़ा जिले में स्थित मानगढ़ पहाड़ी पर है। यह राजस्थान और गुजरात की सीमा पर स्थित ऐतिहासिक स्थल है। इसका सांस्कृतिक और ऐतिहासिक प्रभाव राजस्थान के बांसवाड़ा-डूंगरपुर क्षेत्र से लेकर गुजरात तथा मध्यप्रदेश के जनजातीय अंचलों तक फैला हुआ है। महाराष्ट्र के जनजातीय समाज से भी इसका व्यापक ऐतिहासिक-सांस्कृतिक संबंध है। इस प्रकार मानगढ़ किसी एक राज्य की सीमाओं में सिमटा हुआ स्मृति-स्थल नहीं, बल्कि पश्चिम और मध्य भारत के जनजातीय समाज की साझा ऐतिहासिक विरासत है।
इस क्षेत्र में लंबे समय से आदिवासी समुदायों को बेगार, शोषण, अन्यायपूर्ण वसूली और सामाजिक उत्पीड़न जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता था। इन परिस्थितियों में गोविंद गुरु ने जनजातीय समाज को संगठित करने, सामाजिक कुरीतियों से दूर रहने, नैतिक जीवन अपनाने और सामुदायिक एकता को मजबूत करने का कार्य किया। उनके नेतृत्व में विकसित संप सभा ने आदिवासी समाज में आत्मसम्मान, संगठन और सुधार की चेतना को आगे बढ़ाया।
गोविंद गुरु का योगदान केवल धार्मिक या सामाजिक नेतृत्व तक सीमित नहीं था। उनके विचारों और गतिविधियों ने उस समय की शोषणकारी व्यवस्था को चुनौती दी और आदिवासी समाज में अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता उत्पन्न की। मानगढ़ की धूणी आज भी उनके विचारों, जनजागरण और सामुदायिक एकता की स्मृति रूपी अग्नि से प्रज्वलित है।
17 नवंबर 1913 : मानगढ़ का ऐतिहासिक बलिदान
17 नवंबर 1913 को मानगढ़ पहाड़ी पर गोविंद गुरु के नेतृत्व से प्रेरित बड़ी संख्या में भील आदिवासी एकत्रित हुए थे। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, उस समय लगभग डेढ़ लाख लोगों के जुटने का उल्लेख मिलता है। ब्रिटिश सेना तथा रियासती बलों ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए गोलीबारी की, जिसमें लगभग 1,509 आदिवासियों के बलिदान होने का विवरण गजेटियर अभिलेख में मिलता है।
इस घटना में पुरुषों के साथ महिला और बच्चों ने भी अपने प्राण गंवाए। उनके पास आधुनिक हथियारों और सैन्य संसाधनों से लैस औपनिवेशिक शासन जैसी शक्ति नहीं थी, लेकिन अपने स्वाभिमान, सामाजिक अधिकारों और स्वतंत्र जीवन की आकांक्षा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता दृढ़ थी।
जनजातीय समाज के राष्ट्र के प्रति बलिदान का आकलन केवल जाति आधारित होना उस गौरवशाली समाज की राष्ट्रभक्ति पर प्रश्नचिह्न लगाना है, जो 1857 की क्रांति में स्वतंत्रता आंदोलन का प्रथम ध्वजवाहक बना ।
हम जलियांवाला बाग हत्याकांड को तो जानते हैं, लेकिन उससे पहले और उससे भी बड़ी संख्या में हुए मानगढ़ के नरसंहार को देश के व्यापक जनमानस में वह पहचान नहीं मिल पाई, जिसका वह अधिकारी है। दोनों नरसंहारों के बीच एक महत्त्वपूर्ण अंतर यह है कि जलियांवाला बाग में गोलीबारी अचानक और धोखे से की गई थी; वहाँ एकत्रित लोगों को पहले से यह जानकारी नहीं थी कि उन पर गोलियाँ चलाई जाएँगी। इसके विपरीत, मानगढ़ पहाड़ी पर अंग्रेजी हुकूमत ने पहले ही चेतावनी दे रखी थी कि लोग वहाँ एकत्रित न हों। अंग्रेजी सैनिक भारी गोलाबारूद और तोपों के साथ पहाड़ी के चारों ओर तैनात थे। वहाँ पहुँचने वाला प्रत्येक व्यक्ति जानता था कि वह मारा जा सकता है, फिर भी लाखों भील परिवार सहित मानगढ़ धाम में एकत्रित हुए, गोलियाँ अपने सीने पर खाईं और राष्ट्र के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए।
मानगढ़ का नरसंहार अमृतसर के जलियांवाला बाग नरसंहार से लगभग छह वर्ष पहले हुआ था। इसी ऐतिहासिक क्रम के कारण मानगढ़ को प्रायः ‘आदिवासी जलियांवाला’ कहा जाता है। हालांकि दोनों घटनाओं की परिस्थितियाँ अलग थीं, लेकिन दोनों औपनिवेशिक शासन की दमनकारी प्रवृत्ति और भारतीय जनमानस पर पड़े गहरे प्रभाव की याद दिलाती हैं।
मानगढ़ की त्रासदी का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि इसने स्वतंत्रता संग्राम में जनजातीय समाज की भूमिका को रेखांकित किया। जनजाति समुदाय स्वतंत्रता के बाद केवल लाभ पाने वाला लाभार्थी या आरक्षण लेने वाला समाज नहीं है बल्कि राष्ट्र-निर्माण के सहभागी बने वाला समाज है। उन्होंने औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध संघर्ष में भी अपने प्राणों की आहुति दी। उनका बलिदान पूरे देश का बलिदान है, किसी एक जाति तक सीमित नहीं। उनके बलिदान को राष्ट्रीय इतिहास में वह स्थान मिलना चाहिए, जिसके वे हकदार हैं।
भीलो के शौर्य पराक्रम से रक्तरंजित पवित्र मानगढ़ धाम को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने की मांग हर भारतीय की मांग होनी चाहिए। यह मांग किसी जातीय आग्रह का परिणाम नहीं, बल्कि राष्ट्रीय कृतज्ञता, ऐतिहासिक न्याय और साझा स्मृति की मांग है।

अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम की पहल : राष्ट्रीय जन-जागरण की दिशा में कदम
मानगढ़ धाम को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने की मांग को व्यापक जनसमर्थन दिलाने की दिशा में अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम ने पहल की है। अक्टूबर 2026 में आश्रम के केंद्रीय कार्यकारी मंडल ने मानगढ़ धाम को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने तथा उसके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्त्व के अनुरूप संरक्षण एवं विकास सुनिश्चित करने की मांग करते हुए प्रस्ताव पारित किया। साथ ही विद्यालयों एवं महाविद्यालयों की पाठ्य-पुस्तकों में मानगढ़ के इतिहास को उचित स्थान देने का आग्रह किया गया।
मानगढ़ धाम को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करना क्यों आवश्यक है?

  1. आदिवासी बलिदान को राष्ट्रीय इतिहास में उचित स्थान देने के लिए
  2. गोविंद गुरु के विचारों और सामाजिक सुधार की परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए
  3. इतिहास में उपेक्षित प्रसंगों का दस्तावेजीकरण करने के लिए
  4. राष्ट्रीय एकता और साझा विरासत को मजबूत करने के लिए
  5. जनजातीय समाज के आत्मसम्मान और ऐतिहासिक पहचान के लिए
    अतः मानगढ़ धाम राष्ट्रीय स्मारक के रूप में विकसित होता है, तो यह भावी पीढ़ियों के लिए जीवंत पाठशाला बन सकता है। विद्यार्थी पुस्तकों में केवल तिथियाँ और नाम नहीं पढ़ेंगे, बल्कि यह समझ सकेंगे कि स्वतंत्रता, सामाजिक न्याय और मानवीय गरिमा के लिए लोगों ने कितनी बड़ी कीमत चुकाई। ऐसा स्मारक इतिहास को किसी एक समुदाय की सीमा में बाँधने के बजाय उसे राष्ट्रीय चेतना का हिस्सा बनाएगा। यह नई पीढ़ी में संविधान के मूल्यों, समानता, सामाजिक सद्भाव, देशप्रेम और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने के साहस को समझने का अवसर प्रदान कर सकता है।

मानगढ़ धाम को राष्ट्रीय पहचान देना केवल अतीत के शहीदों को श्रद्धांजलि देना नहीं है; यह आने वाली पीढ़ियों को उनके इतिहास, स्वाभिमान और राष्ट्र के प्रति योगदान से परिचित कराने का संकल्प है।
लेखक
डॉ दीपमाला रावत
विषय विशेषज्ञ, जनजातीय प्रकोष्ठ ,
लोक भवन भोपाल (म.प्र. )

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