गुलाब बत्रा, indireporter.Com
पौधों का कायाकल्प
मानसून में वृक्षारोपण की गूंज सुनाई देने लगी है। सरकारी एवं गैर सरकारी स्तर पर विविध प्रयासों की तैयारी बहुत पहले की जाती है, वृक्षारोपण के मूल में बीज है, नर्सरी मे तैयार किए गए पौधों को आवश्यकतानुसार रोपा जाता है। इसलिए इस जन अभियान को वृक्षारोपण की अपेक्षा पौधारोपण कहा जाना उचित होगा। बीज से पौधा और वृक्ष के रूप में परिवर्तित होने अथवा बीज के कायाकल्प की यात्रा दिलचस्प है।
हर साल मानसून में राजस्थान सहित विभिन्न राज्यों में लाखों करोड़ पौधे लगाये जाते है। अगले वर्षो में ऐसे पौधो के पनपने तथा जीवित रूप में निरंतर बढ़ने की निगरानी का अपेक्षाकृत कम ध्यान रखा जाता है। नतीजतन उपेक्षित पौधों की अकाल मौत हो जाती है। इसके बावजूद पौधारोपण से जुड़े आंकडो की बरसात को लेकर दावे-प्रतिदावे किए जाते है। अब तो जमीनी सच्चाई का पता सुदूर संवेदन तकनीक (रिमोट सेसिंग पद्वति) से लगाना आसान हो गया है। आपातकाल के दौरान युवक कांग्रेस नेता संजय गांधी के पांच सूत्रीय कार्यक्रम में वृक्षारोपण पर विषेष बल दिया गया।
राजस्थान में सरकारी स्तर पर पौधारोपण का प्रचार प्रसार किया गया। तत्सम्बन्धी सरकारी विज्ञप्तियों से किए गए विष्लेषण से वरिष्ठ पत्रकार स्वर्गीय आदित्येन्द्र चतुर्वेदी ने बताया था, कि व्यापक वृक्षारोपण से औसतन हर घर में साढे तीन पेड़ होने चाहिए। लेकिन हकीकत अलग थी। समय-समय पर ऐसे अनेक उदाहरण मीडिया की सुर्खी बने है।
गैर सरकारी स्तर पर वृक्षारोपण के कई अनूठे प्रयास किए गए है। राजधानी जयपुर में पर्यावरण प्रेमी स्वर्गीय मदनलाल पंजाबी ने जवाहर नगर में नीम की वृक्षावली विकसित करने के साथ पेड़ो का जन्मदिन मनाने की अनूठी पहल की। पष्चिमी राजस्थान में समाजसेवी उद्यमी स्वर्गीय किशोर मल खीमावत की पहल पर नीम के वृक्षों का जाल बिछाया गया है जिसकी झलक आने वाले वर्षो में जयपुर तक दिखाई देगी।
पाली जिले के पैतृक गांव रानी से फालना तक 2002 में नीम वृक्षों के रोपण से यह अभियान शुरू हुआ। रानी से जैसलमेर के रामदेवरा तक राजमार्ग के दोनों ओर नीम के वृक्ष उगाने का भगीरथ कार्य हाथ में लिया गया। मध्यकाल के समाज सुधारक बाबा रामदेव के गुरू बालीनाथ जी की जोधपुर के मसूरिया स्थित समाधि मन्दिर स्थल से नीम के कुछ बड़े पौधे लगाकर बड़े होने तक उनक समुचित देखभाल की व्यावहारिक व्यवस्था की गई। आने वाले वर्षो में मसूरिया आकलिया, कालीबेरी, नारवा, इन्द्रोका, तिवरी, घेवड़ा,देचू पोकरण होते हुए रामदेवरा तक लगभग 400 किमी लम्बाई में इस वृक्षावली का विस्तार किया गया। आवश्यकतानुसार क्षेत्रो में नर्सरी स्थापित की गई, पौधारोपण से पहले क्षेत्र विषेष में उपलब्ध भूमि में आवष्यकतानुसार 2 से 3 फिट गहराई में खडडे खोदे गये। इन खडडो में से एक से डेढ़ फिट मिट्टी बाहर निकालकर शेष मिट्टी को नरम करते हुए उसमे खाद एवं कीटनाषक का छिड़काव करते हुए पानी भरा गया। इससे जमीन की गर्मी शांत हुई और पौधा लगाने की तैयारी की गई। पौधा लगाने के साथ ही उसकी सुरक्षा के लिए ट्री गार्ड लगाये गये। नीम वृक्ष के फैलाव को देखते हुए पौधारोपण में पर्याप्त दूरी रखी गई। नियमित रूप से टैंकरो से पानी पिलाने और पेड़ का तना करीब आधा फिट होने पर उसे स्वतंत्र छोड़ा गया।
पाली से जोधपुर हाइवे, सिरोही से पिण्डवाड़ा और प्रसिद्व रणकपुर मन्दिर तथा सांडेराव से पाली हेाते हुए ब्यावर तक नीम की वृक्षावली लगाई जा चुकी है। अगले वर्ष से यह वृक्षावली जयपुर की ओर विस्तार लेगी। किशोर मल खीमावत का 2012 में निधन हो गया लेकिन उनके ट्रस्ट श्री राज राजेन्द्र बसंती देवी किशोर मल खीमावत चेरिटेबल ट्रस्ट द्वारा वृक्षारोपण सहित सामाजिक सरोकारों से जुडे अन्य कार्य हाथ मे लिए जा रहे है। ट्रस्ट के मैनेजर रंजीत ढालावत के अनुसार अब तक नीम के लगभग 25 लाख वृक्ष पनपाये गये है और वे शत प्रतिषत जीवित है। ट्रस्ट द्वारा पौधारोपण एवं उसके वृक्ष के रूप में परिवर्तित होने की कार्यप्रणाली के अनुसरण की आवष्यकता है। विभिन्न स्तर पर षिक्षण संस्थाओं, सामाजिक धार्मिक संगठनों, संस्थाओं के माध्यम से पौधों को वृक्ष के रूप मे पनपाने की व्यावहारिक कार्ययोजनाओं को मूर्त रूप देकर पर्यावरण की सुरक्षा एवं जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न चुनौतियों का सामना किया जा सकता है।
