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“न्याय का तराजू और समाज का चेहरा” सचमुच कुछ जिंदगियां अधिक मूल्यवान हो गई ?

Rajesh Kumawat
Last updated: May 27, 2026 3:11 am
Rajesh Kumawat Published May 27, 2026
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एडवोकेट आयुष शर्मा,indireporter.com

देश इस समय दो अलग-अलग घटनाओं पर बँटा हुआ दिखाई देता है।
एक ओर एक युवती की संदिग्ध मृत्यु पर व्यापक जनाक्रोश, मीडिया बहसें, स्वतः संज्ञान, सीबीआई जाँच और संस्थागत सक्रियता दिखाई देती है; वहीं दूसरी ओर एक पुरुष की आत्महत्या अथवा मानसिक प्रताड़ना से जुड़े आरोपों पर अपेक्षाकृत सीमित संवेदनशीलता और धीमी सामाजिक प्रतिक्रिया देखने को मिलती है।

यहीं से एक कठिन, किंतु आवश्यक प्रश्न जन्म लेता है—
क्या हमारे समाज और न्याय व्यवस्था में संवेदनाएँ भी लिंग आधारित होती जा रही हैं?

हाल के चर्चित मामलों ने यह विमर्श तेज किया है कि महिला सुरक्षा के प्रश्नों पर संस्थाएँ अपेक्षाकृत अधिक सक्रिय दिखाई देती हैं, जबकि पुरुषों की मानसिक प्रताड़ना, वैवाहिक उत्पीड़न अथवा आत्महत्या जैसे विषयों पर सार्वजनिक विमर्श उतना मुखर नहीं हो पाता। दूसरी ओर, महिलाओं के अधिकारों से जुड़े पक्ष का कहना है कि भारत में घरेलू हिंसा, दहेज और स्त्री उत्पीड़न की ऐतिहासिक और सामाजिक वास्तविकताएँ अब भी भयावह हैं, इसलिए संस्थागत संवेदनशीलता आवश्यक है।

सच्चाई संभवतः इन दोनों अतियों के बीच कहीं खड़ी है।

न्यायपालिका का मूल सिद्धांत है—
“Justice must not only be done, but must also be seen to be done.”
अर्थात न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए।

जब किसी मामले में तीव्र मीडिया ट्रायल, सोशल मीडिया अभियानों और भावनात्मक ध्रुवीकरण के बीच संस्थागत कार्रवाई होती है, तब आम नागरिक तुलना करने लगता है। यही तुलना कभी-कभी न्याय व्यवस्था पर अविश्वास का कारण बनती है। सुप्रीम कोर्ट ने भी हालिया मामले में यह टिप्पणी की कि न्यायपालिका के विरुद्ध “नैरेटिव” बनाना उचित नहीं है और निष्पक्ष जाँच पर भरोसा रखा जाना चाहिए।

परंतु समाज का प्रश्न भी निराधार नहीं है।
यदि किसी महिला की पीड़ा पर राष्ट्र आक्रोशित होता है, तो यह सकारात्मक संवेदनशीलता है; लेकिन यदि किसी पुरुष की मानसिक वेदना, पारिवारिक उत्पीड़न या आत्महत्या पर समाज मौन रहता है, तो यह भी चिंता का विषय है।

आज आवश्यकता “पुरुष बनाम महिला” की बहस की नहीं, बल्कि “पीड़ित बनाम अन्याय” की सोच विकसित करने की है।

दुर्भाग्य से भारतीय सामाजिक संरचना में पुरुषों को बचपन से यह सिखाया जाता है कि वे अपनी भावनाएँ प्रकट न करें।
“मर्द को दर्द नहीं होता” जैसी सोच ने हजारों पुरुषों को मानसिक अवसाद, वैवाहिक तनाव और सामाजिक अकेलेपन की ओर धकेला है। जब कोई पुरुष मानसिक प्रताड़ना की बात करता है, तो समाज अक्सर उसका उपहास कर देता है।

यह भी उतना ही खतरनाक है जितना किसी महिला की शिकायत को नज़रअंदाज़ करना।

कानून का उद्देश्य किसी एक लिंग का पक्ष लेना नहीं, बल्कि हर पीड़ित को सुरक्षा देना है। संविधान का अनुच्छेद 14 “समानता” की बात करता है— विशेषाधिकार की नहीं।
यदि कोई महिला उत्पीड़ित है तो उसे न्याय अवश्य मिले;
यदि कोई पुरुष प्रताड़ित है तो उसकी आवाज़ भी उतनी ही गंभीरता से सुनी जाए।

हमें यह समझना होगा कि न्याय भावनात्मक भीड़तंत्र से नहीं, तथ्यों और निष्पक्ष जाँच से संचालित होता है। मीडिया ट्रायल और सोशल मीडिया अभियानों के दबाव में बनने वाली धारणाएँ कभी-कभी न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने का खतरा उत्पन्न करती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी संबंधित पक्षों और मीडिया से संयम बरतने की अपील की है।

समाज को यह तय करना होगा कि—
क्या हम न्याय को “जेंडर आधारित संवेदना” से देखेंगे?
या “मानव पीड़ा” के आधार पर?

किसी बेटी की मृत्यु पर देश का रो पड़ना हमारी संवेदनशीलता है।
लेकिन किसी बेटे की चुप्पी को अनसुना कर देना हमारी सामाजिक विफलता है।

न्याय का तराज़ू तभी संतुलित रहेगा जब उसमें स्त्री और पुरुष नहीं, बल्कि केवल सत्य और पीड़ा का वजन रखा जाएगा।

और शायद उसी दिन हम यह कह पाएँगे—
इस देश में हर जीवन समान रूप से मूल्यवान है।

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