विजय शंकर पांडे, indireporter.com
परिवर्तन प्रकृति का नियम है! स्थान, काल, पात्र को देते हुए परिस्थितियों बदल जाती है।
भक्तों, आज मीडिया ने यह कहा कि मंदिर की झांकियों के बीच में गैप रहने से भक्तों को दर्शन के लिए लाइन लगानी पड़ती है और परिक्रमा भी पूरी नहीं कर पाते, जबकि ठाकुर जी की तीन परिक्रमा होती हैं।
साथ ही मीडिया ने यह उदाहरण दिया कि सालासर बालाजी, खाटू श्याम जी,
जैसे मंदिरों में तो गैप नहीं होता और दर्शन की लाइन चलती रहती है।
लेकिन एक बात सोचने की है !
जब आप गैप के उदाहरण इन मंदिरों के दे रहे हैं, तो परिक्रमा के उदाहरण भी वहीं से क्यों नहीं ले रहे?
क्या आपने देखा है, कि
खाटू श्याम जी में परिक्रमा की अनुमति है?
सालासर बालाजी में भक्त परिक्रमा कर सकते हैं?
इन मंदिरों में तो परिक्रमा पूरी तरह से बंद है।
वहीं हमारे ठाकुर श्री गोविंद देवजी के मंदिर में परिक्रमा होती है, भले भीड़ के दिनों में कुछ समय के लिए व्यवस्थित की जाती हो।
तो फिर अगर वहां का गैप सिस्टम (यानि बिना गैप के सीधी लाइन) आपको उचित लगता है,
तो वहां की परिक्रमा व्यवस्था (जो बिल्कुल भी नहीं है) उसे भी उचित मानेंगे?
परिक्रमा कोई भीड़ का विषय नहीं, आस्था और परंपरा का विषय है।
अगर व्यवस्था की मजबूरी में इन बड़े मंदिरों ने परिक्रमा बंद कर दी,
तो क्या यहां भी परंपरा को छोड़ देना चाहिए?
सोचिए – व्यवस्था का समाधान व्यवस्था बदलने में नहीं, बल्कि भक्तों के स्वयं के अनुशासन और मंदिर की परंपरा के सम्मान में है।
मीडिया से भी निवेदन है –
जब उदाहरण दीजिए तो पूरा दीजिए, केवल वह हिस्सा नहीं जो आपके तर्क को सही साबित करे।
परंपरा का सम्मान करना, सही खबर देना और भक्तों को सच्चाई बताना आपकी भी जिम्मेदारी है।
जय श्रीराधि गोविन्द देवजी।
